पश्चिम एशिया में महायुद्ध की आहट: क्या जयशंकर की कूटनीति बचाएगी भारत का व्यापार? तेहरान का बड़ा फैसला
ईरान-इजरायल युद्ध के बीच पश्चिम एशिया में तनाव चरम पर है। जानें कैसे भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर की 'मानवीय कूटनीति' ने होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) में भारतीय जहाजों के लिए रास्ता सुरक्षित कराया।
आज जब पश्चिम एशिया (West Asia) एक विनाशकारी युद्ध के मुहाने पर खड़ा है, जहाँ अमेरिका के परमाणु बमवर्षक और ईरान की मिसाइलें आमने-सामने हैं, भारत ने अपनी कूटनीतिक सूझबूझ से एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। तेहरान ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि भीषण युद्ध की स्थिति में भी होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से गुजरने वाले भारतीय व्यापारिक जहाजों को सुरक्षित गलियारा (Safe Passage) दिया जाएगा।
जयशंकर का 'कोच्चि कार्ड': मानवता बनाम युद्ध
इस पूरी कहानी के पीछे विदेश मंत्री एस. जयशंकर की वह 'साहसिक कूटनीति' है, जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया। जब अरब सागर में तनाव चरम पर था, तब भारत ने तकनीकी खराबी से जूझ रहे ईरानी युद्धपोत IRIS Lavan को केरल के कोच्चि पोर्ट पर डॉक करने की अनुमति दी।
पश्चिमी देशों के दबाव के बावजूद जयशंकर ने इसे 'मानवीय आधार' पर लिया गया फैसला बताया। इस एक कदम ने तेहरान के साथ भारत के रिश्तों में जमी बर्फ को पिघला दिया। इसके बदले में, ईरान के शीर्ष नेतृत्व ने भारत को आश्वासन दिया है कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) बाधित होने के बावजूद भारत का व्यापारिक मार्ग प्रभावित नहीं होगा।
क्यों अहम है यह 'शिपिंग कॉरिडोर'?
भारत के लिए यह खबर किसी संजीवनी से कम नहीं है, क्योंकि:
-
तेल की लाइफलाइन: भारत की ऊर्जा जरूरतों का लगभग 40% हिस्सा इसी संकरे समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है।
-
लाखों भारतीयों की सुरक्षा: खाड़ी देशों में काम करने वाले 90 लाख भारतीयों के लिए यह मार्ग रसद और आपातकालीन निकासी का मुख्य जरिया है।
-
आर्थिक स्थिरता: होर्मुज में रुकावट का मतलब है भारत में महंगाई का अनियंत्रित होना।
ईरान की 'शतरंज की चाल' और भारत की तटस्थता
ईरान के उप विदेश मंत्री ने हाल ही में नई दिल्ली में कहा कि वे अमेरिका की तरह "फुटबॉल" (आक्रामक प्रहार) नहीं, बल्कि "शतरंज" (रणनीतिक संयम) खेल रहे हैं। ईरान जानता है कि भारत जैसे बड़े बाजार को नाराज करना उसके आर्थिक हितों के खिलाफ होगा। वहीं, भारत ने भी चाबहार पोर्ट के जरिए मध्य एशिया तक अपनी पहुंच बनाने के संकल्प को दोहराकर यह साफ कर दिया है कि वह किसी भी गुटबाजी का हिस्सा नहीं बनेगा।
युद्ध की छाया में भारत की स्थिति
नीचे दी गई तालिका मौजूदा संकट के बीच भारत की चुनौतियों को दर्शाती है:
| संकट का क्षेत्र | भारत की चुनौती | समाधान/कदम |
| होर्मुज जलडमरूमध्य | तेल आपूर्ति में बाधा | ईरान के साथ 'स्पेशल कॉरिडोर' समझौता |
| कोच्चि डॉकिंग | अमेरिकी प्रतिबंधों का डर | 'मानवीय सहायता' का कूटनीतिक तर्क |
| इजरायल-ईरान युद्ध | दोनों मित्रों के बीच संतुलन | द्विपक्षीय बातचीत और शांति की अपील |
एक नई वैश्विक व्यवस्था की ओर
पश्चिम एशिया में "एयर आर्मगेडन" की धमकियों के बीच भारत की संतुलित विदेश नीति एक मिसाल पेश कर रही है। एस. जयशंकर ने यह साबित कर दिया है कि राष्ट्रहित सर्वोपरि है। यदि भारत इस कॉरिडोर को सुरक्षित रखने में सफल रहता है, तो यह 21वीं सदी की सबसे बड़ी कूटनीतिक जीतों में से एक होगी।
युद्ध की लपटें भले ही आसमान को छू रही हों, लेकिन भारत की कूटनीति ने समुद्र की लहरों पर अपने लिए शांति और व्यापार का रास्ता ढूंढ लिया है।





